ZEE जानकारी: आखिर यरुशलम दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं ?

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कोई भी विवाद… जितना पुराना होता है.. उसे सुलझाना उतना ही मुश्किल होता है. आपने भारत के कई पुराने विवादों के बारे में खबरें पढ़ी, सुनी और देखी होंगी . उदाहरण के तौर पर अयोध्या विवाद.. करीब 500 साल पुराना है . और कश्मीर विवाद.. करीब 70 साल पुराना है . लेकिन आपको शायद दुनिया के सबसे पुराने विवाद के बारे में पता नहीं होगा… दुनिया का सबसे पुराना विवाद है…. ‘Jerusalem’ . 

वैसे तो Jerusalem एक शहर का नाम है.. लेकिन आप इस शहर को करीब एक हज़ार वर्ष पुराना विवाद भी कह सकते हैं. पिछले 24 घंटों में Jerusalem के विवाद में अब एक नया मोड़ आ गया है. क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने Jerusalem को Israel की राजधानी के रूप में मान्यता दे दी है . Israel, Jerusalem को ही अपनी राजधानी मानता है . लेकिन दुनिया के ज़्यादातर देश इससे सहमत नहीं हैं . वो Tel Aviv को Israel की राजधानी मानते हैं . बहुत सारे देशों के दूतावास भी Tel Aviv में ही है . लेकिन अब अमेरिका ने ये फैसला किया है कि वो अपना दूतावास Jerusalem में Shift कर देगा.

ये दुनिया की राजनीति और कूटनीति में एक बहुत बड़ा बदलाव है . अमेरिका के इस फैसले से Middle East में राजनीतिक भूकंप आ गया है . अब Israel और अमेरिका के खिलाफ अरब देश एकजुट हो रहे हैं . गाज़ा पट्टी में फिलिस्तीन के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं . पूरे Middle East में एक तनाव सा फैल गया है . Turkey, Saudi Arab, Egypt, Iran, Jordan, France, China, Russia और Britain ने डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले को गलत बताया है . Palestine ने Israel और अमेरिका को चेतावनी दी है कि इसके परिणाम बहुत ख़तरनाक होंगे . आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट और अलकायदा ने भी अमेरिका पर हमला करने की धमकी दी है. इन परिस्थितियों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई है. दूसरी तरफ Israel ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले का स्वागत किया है . Israel के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है. पिछले 24 घंटे से ये दुनिया की सबसे बड़ी और चर्चित ख़बर है.

आप ये सोच रहे होंगे कि आखिर Jerusalem दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं ? Jerusalem के नाम खून-खराबे की धमकी क्यों दी जा रही है ? इस सवाल का जवाब Jerusalem के इतिहास में छिपा हुआ है.. अगर आप अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ बनना चाहते हैं और Middle East की राजनीति को अच्छी तरह समझना चाहते हैं तो आपको हमारा ये विश्लेषण बहुत ध्यान से देखना होगा . हम आपको इस विवाद के हर पहलू के बारे में समझाएंगे . 

सबसे पहले आपको ये समझना चाहिए कि Jerusalem पूरी दुनिया के लिए क्यों महत्वपूर्ण है . Jerusalem… दुनिया के तीन बड़े धर्मों की आस्था से जुड़ा है . यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धर्म के लिए Jerusalem एक पवित्र नगर है . विवाद को बारीकी से समझने के लिए आपको इसका पूरा इतिहास समझना होगा . विद्वानों का ये मानना है कि आज से करीब 5,000 वर्ष पहले Jerusalem में इंसानों ने बसना शुरू किया . 

आज से 3 हजार वर्ष पहले यहूदियों के King David ने Jerusalem को अपने यहूदी साम्राज्य की राजधानी बनाया . King David के बाद उनके बेटे Solomon ने Jerusalem में पहला धर्मस्थल बनाया . ये यहूदियों का धर्मस्थल था . यहूदियों के इतिहास में King Solomon का बहुत सम्मान है . इस तरह देखा जाए तो Jerusalem, यहूदियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण शहर है . 

आज से 1 हज़ार 987 वर्ष पहले Jerusalem में ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था . इस तरह ईसाईयों के लिए भी Jerusalem एक बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है. इस घटना के करीब 600 वर्ष बाद Jerusalem मुस्लिमों के लिए भी एक बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बन गया . क्योंकि इस्लाम में ये मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद साहब ने Jerusalem से ही स्वर्ग की यात्रा की थी. 

यानी तीनों ही धर्मों के लिए Jerusalem एक पवित्र शहर है . और तीनों ही धर्म के लोगों ने हमेशा Jerusalem पर नियंत्रण करने की कोशिश की. चाहे कुछ भी हो जाए…. Jerusalem पर कब्ज़े को ईसाईयों, मुसलमानों और यहूदियों ने हमेशा अपनी आन बान और शान से जोड़ कर देखा है. अगर हम ये सवाल पूछें कि दुनिया में किस चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा खून बहा है.. तो सिर्फ एक ही जवाब होगा.. Jerusalem . Jerusalem पर कब्ज़े के लिए ईसाईयों और मुसलमानों के बीच 200 वर्ष तक युद्ध लड़ा गया है . इन युद्धों को पश्चिम के इतिहासकारों ने Crusades कहा . 

इन धर्मयुद्धों के केंद्र में Jerusalem था . Jerusalem पर कब्जे के लिए ईसाइयों और मुसमलानों के बीच कई धर्मयुद्ध लड़े गए . इतिहास की कई किताबों का अध्ययन करने पर ये पता चलता है कि Jerusalem के लिए पहला धर्मयुद्ध वर्ष 1098 से 1099 के बीच लड़ा गया था. इस युद्ध में यूरोप के देशों की जीत हुई थी और Jerusalem पर ईसाईयों ने कब्जा जमा लिया था. कहा जाता है कि इसके बाद Jerusalem में बहुत खून बहाया गया था. 

दूसरा धर्मयुद्ध वर्ष 1145 से वर्ष 1149 के बीच लड़ा गया . इस युद्ध के बाद ईसाइयों की पकड़ Jerusalem पर कमज़ोर हो गई . जबकि तीसरा धर्मयुद्ध वर्ष 1189 ईस्वी में शुरू हुआ . इस धर्मयुद्ध में ईसाइयों की बहुत बुरी हार हुई . Egypt और Syria के सुल्तान सलादीन यूसुफ ने Jerusalem पर कब्ज़ा जमा लिया . और Jerusalem पर मुसलमानों का अधिकार हो गया. इसके बाद दो और धर्मयुद्ध हुए लेकिन इनमें यूरोपीय देशों को सफलता नहीं मिली. इसके बाद 20वीं शताब्दी में पहला विश्व युद्ध खत्म होने तक…यानी वर्ष 1917 तक Jerusalem पर मुसलमानों का कब्ज़ा रहा. 

इतिहासकारों का मानना है कि सबसे पहले Jerusalem, यहूदियों के राजा King David की राजधानी थी . लेकिन ईसाई और इस्लाम धर्म के विस्तार के बाद यूरोप और एशिया में यहूदी लगातार कमजोर होते गए . यहूदी लोग पूरी दुनिया में बिखर गए और उन पर अत्याचार शुरू हो गए . 19वीं शताब्दी में थियोडौर हैरत्ज़ल नाम के एक यहूदी विचारक थे. उन्होंने यहूदी राष्ट्रवाद की नींव रखी थी. इसके बाद पूरी दुनिया के यहूदियों ने ये संकल्प लिया कि Jerusalem उनकी मातृभूमि है और उन्हें दोबारा Jerusalem पर कब्ज़ा करना है.

इसके बाद बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पहले विश्व युद्ध के दौरान Jerusalem पर ब्रिटेन का कब्जा हो गया और 700 वर्षों के बाद Jerusalem.. गैर-मुसलमानों के हाथों में चला गया . और यहीं से Israel की स्थापनी की कहानी शुरू होती है . कहा जाता है कि ब्रिटेन ने यहूदियों को Jerusalem में बसाने का लालच देकर पहले विश्व युद्ध में यहूदियों का समर्थन हासिल कर लिया . बहुत ही चालाकी से ब्रिटेन ने अरब देशों को भी Jerusalem का लालच दिया था .

आज के Israel को तब फिलिस्तीन कहा जाता था और उसमें अरब के मुसलमानों की आबादी थी . लेकिन बहुत व्यवस्थित तरीके से यहूदियों ने Jerusalem की तरफ पलायन किया . धीरे-धीरे पूरे इलाके में यहूदियों की आबादी बहुत बढ़ गई और अरब के मुसलमान कमज़ोर होते गए . वर्ष 1947 में United Nations ने Israel को एक देश के तौर पर मान्यता दे दी . लेकिन Jerusalem को एक अंतर्राष्ट्रीय शहर के तौर पर मान्यता दी गई . ताकि सर्वधर्म समभाव बना रहे . तब Jerusalem पर Israel का नियंत्रण नहीं था. अब हम आपको नक्शों की मदद से ये समझाने की कोशिश करेंगे कि कैसे धीरे धीरे फिलिस्तीन गायब होता गया . और इजराइल एक देश के रूप में स्थापित हो गया 

इस नक्शे में जो हिस्सा काले रंग का है वो फिलिस्तीन के प्रभाव का है और जो हिस्सा पीले रंग का है वो इजराइल के प्रभाव वाला है . सबसे पहले वर्ष 1917 का Map देखिए जिसमें सिर्फ फिलिस्तीन ही दिखाई दे रहा है .  इसके बाद वर्ष 1947 में जब इजराइल की स्थापना हुई तो Map में ये बदलाव आया . दक्षिणी हिस्से में इजराइल की स्थिति मजबूत थी . और Jerusalem के साथ ज़्यादातर उत्तरी हिस्से पर फिलिस्तीन का कब्जा था. 

1948 में अरब देशों और इजराइल के बीच हुए पहले युद्ध के बाद फिलिस्तीन के कब्ज़े वाला इलाका और कम हो गया .  हालांकि Jerusalem के कुछ हिस्सों पर तब भी फिलिस्तीन का कब्ज़ा था .  वर्ष 1967 में अरब देशों और इजराइल के बीच एक और युद्ध के बाद.. Egypt के कुछ हिस्सों पर भी इजराइल ने कब्जा कर लिया . हालांकि बाद में एक समझौते के तहत इजराइल ने ये हिस्सा Egypt को वापस कर दिया . अब ये आज का Map है जिसमें फिलिस्तीन सिर्फ West Bank और Gaza तक सिमटकर रह गया है 

Israel की स्थापना हो गई और कई वर्षों के संघर्ष के बाद Egypt और Saudi Arab समेत कुछ मुस्लिम देशों ने Israel को मान्यता भी दे दी लेकिन Jerusalem में मौजूद धर्मस्थलों का विवाद अब तक सुलझा नहीं है . Jerusalem में एक ऊंचे इलाके में Dome Of Rocks है. यहूदियों की मान्यता है कि यहां पर King Solomon ने पूजा स्थल बनवाया था . और इसी के पास अल अक्सा मस्जिद है . कहा जाता है यहीं से पैगंबर मुहम्मद साहब ने स्वर्ग की यात्रा की थी . यहां पर एक Western Wall भी है जो यहूदी धर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है.

अरब देशों का दावा है कि Israel… Jerusalem में मुस्लिम तीर्थ यात्रियों पर तरह तरह की पाबंदियां लगाता है . जो गलत है . आज भी दुनिया Jerusalem की समस्या का कोई हल नहीं निकाल पाई है. ये सभ्यताओं का संघर्ष है.. जो 21वीं शताब्दी में भी जारी है.

 

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