वो गांव, जिसने अमेठी को दुनियाभर में पहचान दिलाई

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साल 1976 की बात है. देश भर में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में भारत में लगे आपातकाल के ‘काले दौर’ की चर्चा हो रही थी, लेकिन नवंबर महीने में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले में अमेठी कस्बे के पास का खेरौना गांव एक दूसरी वजह से अचानक देश और दुनिया के अख़बारों की हेडलाइन बन गया.

अमेठी से सटे इस गांव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी अपने कुछ युवा साथियों के साथ यहां पहुंचे और फ़ावड़ा चलाकर उन्होंने सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया.

उनके साथ देश भर से बड़ी संख्या में युवा कांग्रेस के लोग श्रमदान के लिए यहां आकर जुटे थे और उससे पहले सैकड़ों फ़ावड़े, कुदाल, टोकरे और तमाम ज़रूरी सामान यहां भेजे जा चुके थे.

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महीने से अधिक चला श्रमदान

श्रमदान एक-दो दिन तक नहीं हुआ बल्कि ये महीने भर से ज़्यादा चला और लगातार चला. यही नहीं, श्रमदान के लिए बाहर से आए लोग यहीं रुके थे.

उनके लिए खाना यहीं बन रहा था, रुकने की व्यवस्था गांव के लोगों ने अपने घरों में कर रखी थी और रोज़ मनोरंजन के लिए कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे.

कुल मिलाकर क़रीब डेढ़ महीने तक यहां का माहौल उत्सवधर्मी बना रहा.

उस समय खेरौना गांव के प्रधान थे रामनरेश शुक्ल. इस समय रामनरेश शुक्ल की उम्र सौ साल से ऊपर है लेकिन अब वो न तो बोल पाते हैं और न ही सुन पाते हैं.

उनके बड़े बेटे राजेंद्र प्रसाद शुक्ल उस वक़्त को याद करते हैं, “श्रमदान से ही संजय गांधी की राजनीति की शुरुआत हुई थी. तीन सड़कों पर श्रमदान हुआ था. बाद में तीनों सड़कें डामर हो गईं. डेढ़ महीने तक तो यहां मेला लगा था. तमाम राज्यों से लोग आ रहे थे और श्रमदान कर रहे थे. डीएम, एसपी और तमाम बड़े अधिकारी यहां डेरा डाले हुए थे.”

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उमाकांत द्विवेदी

संजय गांधी की राजनीतिक ज़मीन बनी अमेठी

दरअसल, संजय गांधी राजनीतिक परिदृश्य में तो आपातकाल से पहले ही आ चुके थे, लेकिन राजनीति में अभी वो नहीं आए थे. यहीं से उनके लिए राजनीतिक ज़मीन तैयार करने की कोशिश हो रही थी और उसके लिए अमेठी संसदीय क्षेत्र को चुना गया.

अमेठी को संसदीय क्षेत्र बने अभी दस साल भी नहीं हुए थे और इस क़स्बे की पहचान महज़ एक संसदीय क्षेत्र के ही रूप में थी, इससे ज़्यादा नहीं. यानी जिस रूप में आज उसे राजनीतिक तौर पर एक वीआईपी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है तब तक ऐसा कुछ भी नहीं था.

अमेठी में कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता उमाकांत द्विवेदी उन लोगों में से हैं जिन्होंने श्रमदान में पूरे समय तक सक्रिय भूमिका निभाई.

वो कहते हैं, “1971 तक यहां से विद्याधर वाजपेयी कांग्रेस पार्टी से सांसद थे. वो थे उन्नाव के लेकिन चुनाव अमेठी से लड़ते थे. गांधी परिवार के बेहद क़रीबी थे और जब ये बात चली कि संजय गांधी राजनीति में आ रहे हैं तो उन्होंने संजय गांधी को एक तौर से गोद ले लिया और सार्वजनिक रूप से ये घोषणा की कि वो अपनी सीट संजय गांधी के लिए छोड़ रहे हैं.”

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खेरौना गांव

चुनाव में उतरने से पहले किया विकास कार्य

द्विवेदी बताते हैं कि 1971 के चुनाव में खेरौना गांव में एक जनसभा हुई थी. उस जनसभा में इंदिरा गांधी भी थीं और काफी भीड़ हुई थी.

इसीलिए जब अमेठी संसदीय क्षेत्र को संजय गांधी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के रूप में चयनित किया गया तो ख़ुद संजय गांधी ने यहां से चुनाव लड़ने से पहले विकास कार्य करने की शुरुआत की और उसी क्रम में श्रमदान का फ़ैसला लिया.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डॉक्टर संजय सिंह अमेठी के राजघराने से ताल्लुक़ रखते हैं.

वो कहते हैं, “क़रीब एक हज़ार यूथ कांग्रेस के लोग आए थे. रात दिन मजमा लगा था. मैं तो खिलाड़ी था, लेकिन संजय गांधी ने कहा कि यहां रहना है. बस फिर क्या था, खेल-वेल सब छोड़कर हम लोग लगे सड़क बनाने और वो तीनों सड़कें आज भी क़ायम हैं.”

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राजेंद्र प्रसाद शुक्ल

खेरौना गांव

संजय सिंह कहते हैं कि इसी गांव को श्रमदान के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि ये अमेठी से बिल्कुल लगा हुआ था और कोई ख़ास वजह नहीं थी.

इस श्रमदान के बाद खेरौना गांव में तीन सड़कें बनीं. तीनों आज भी बेहतर स्थिति में हैं.

गांव में और भी संपर्क मार्ग हैं, स्कूल हैं और बाज़ार भी है. लेकिन लोगों का कहना है कि डेढ़-दो महीने के उस उत्सवधर्मी माहौल के बाद उनके गांव में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे वो लोग याद करें.

इतना काम होने के बावजूद, इससे संबंधित कोई एक पत्थर या निशान भी गांव में नहीं है. गांव के कुछ छोटे बच्चों को तो अब संजय गांधी का नाम भी याद नहीं है जबकि कुछेक बार को छोड़कर यहां गांधी परिवार के लोग ही सांसद बनते रहे हैं.

रामसागर आज क़रीब सत्तर साल के हैं लेकिन तब युवा थे. उस समय को याद करके उनकी तरुणाई एक बार फिर जैसे कुलांचे मारने लगती है.

ठेठ अवधी में बताते हैं, “जगह-जगह से लोग आए थे. तमाम पढ़ी-लिखी लड़कियां आईं थीं, वो भी श्रमदान कर रही थीं. दिन भर इसलिए हम लोग मेहनत करते थे कि बढ़िया खाना-पीना तो मिलेगा ही, गाना-बजाना भी सुनने को मिलेगा.”

गांव की एक महिला अमरावती देवी कहती हैं, “तब औरतें ज़्यादा घरों से नहीं निकलती थीं लेकिन जब बाहर से आकर औरतें यहां हम लोगों की सड़क बना रही थीं, तो उन्हें देखकर गांव की औरतें भी बाहर निकलीं. सब एक-दूसरे की देखा-देखी काम कर रहे थे.”

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अमेठी से पहला चुनाव हारे संजय गांधी

हालांकि अगले ही साल यानी 1977 में लोकसभा के चुनाव हुए और चुनावी मैदान में पहली बार उतरे संजय गांधी को इसी अमेठी सीट से हार का सामना करना पड़ा.

जनता पार्टी के रवींद्र प्रताप सिंह ने उन्हें हरा दिया. लेकिन 1980 में जब दोबारा चुनाव हुए तो संजय गांधी ने इस सीट से भारी बहुमत से चुनाव जीता.

उमाकांत द्विवेदी बताते हैं, “इमरजेंसी और उसमें भी जो नसबंदी का अभियान चला, उसने कांग्रेस के ख़िलाफ़ लोगों में एक तरह से नफ़रत पैदा कर दी. संजय गांधी ने सिर्फ़ श्रमदान ही नहीं किया था बल्कि जगदीशपुर को औद्योगिक क्षेत्र बनाने की भूमिका भी तभी बन गई और उनके चुनाव लड़ने की घोषणा से पहले ही कुछ काम शुरू भी हो गए, लेकिन जनता के ग़ुस्से के आगे उनके ये सब काम धरे रह गए.”

बहरहाल, क़रीब 41 साल पहले अमेठी को राष्ट्रीय परिदृश्य में जगह दिलाने वाला ये गांव, आज भी लगभग उसी स्थिति में है.

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हालांकि ज़्यादातर लोगों के घर पक्के बने हुए हैं, सड़कें हैं ही और अमेठी से लगा होने के कारण स्कूल और अस्पताल की सुविधा भी है लेकिन आज की युवा पीढ़ी को न तो उस श्रमदान के बारे में बहुत कुछ मालूम है और न ही श्रमदान के बाद गांव की स्थिति में कुछ ऐसा बदलाव आया जो कि युवाओं को ये महसूस करा सके कि उनके गांव की अहमियत दूसरों गांवों की तुलना में कुछ अलग है.

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