‘मेरी डिज़ायर का मेरी डिसएबिलिटी से कोई लेना-देना नहीं है’

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मैं देख नहीं सकती तो क्या? चाहत के अहसास और इश्क की ज़रूरत तो सबको होती है.

मुझे भी है. उतनी ही शिद्दत से, जैसे आपको. मेरी ‘डिज़ायर’ का मेरी ‘डिसएबिलिटी’ से कोई लेना-देना नहीं है.

बस उसे महसूस करने का मेरा अनुभव अलग है.

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दरअसल बचपन में मैं आप जैसी ही थी. देख सकती थी. एक छोटे शहर के ‘नॉर्मल’ स्कूल में पढ़ती थी.

पर तब छोटी थी तो लड़कों के साथ सिर्फ़ दोस्ती का रिश्ता था.

नवीं क्लास में अचानक मेरी आंखों की रौशनी जाने लगी और साल भर में ही पूरी तरह ख़त्म हो गई.

मुझे ‘ब्लाइंड’ बच्चों के ‘स्पेशल’ स्कूल में दिल्ली भेज दिया गया. आम लड़कों से कोई मेलजोल नहीं रहा.

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चाहत का ब्लाइंड होने से कोई रिश्ता नहीं

फिर कॉलेज में आई. फिर से आम दुनिया में. एक जवान लड़की के सवालों और सपनों के साथ.

मैं आकर्षक तो लगना चाहती थी पर लड़कों से थोड़ी दूरी भी बनाए रखना चाहती थी.

इसका मेरे ‘ब्लाइंड’ होने से कोई लेनादेना नहीं था. बस, एक लड़की होने के नाते ये चाहत थी.

जो सब लड़कों के लिए ‘डिज़ायरेबल’ होना चाहती है पर सिर्फ़ एक ख़ास लड़के के लिए ‘अवेलेबल’.

लेकिन स्पेशल स्कूल की वजह से आम दुनिया से मिलने-जुलने की आदत और सलीका छूट गया था.

जब देख सकती थी तो लड़कों की आंखों से उनकी नीयत का पता चल जाता था पर अब लड़कों के बीच आत्मविश्वास ही खो जाता था.

कैंटीन, क्लास या लाइब्रेरी तक जाने के लिए मदद लेने में कोफ़्त होती थी, पर वो मजबूरी बन गई थी.

हाथ पकड़ना इतना आम था कि पहली बार हाथ पकड़ने की झिझक या गर्मजोशी का अहसास मायने ही नहीं रखता था. पर चाहत बरक़रार थी.

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जान पहचान से शुरुआत

फिर मुझे वो लड़का मिला. या यूं कहूं कि उस लड़के ने मुझे ढूंढ लिया.

वो ‘ब्लाइंड’ नहीं है पर उसे काफ़ी कम दिखाई देता है. तकनीकी तौर पर वो ‘पार्शली-साइटिड’ है.

यानी वो मुझे देख सकता है.

वो यूनिवर्सिटी में मेरा सीनियर था और इसी नाते कुछ दोस्तों ने हमें मिलवाया.

उसने बाद में मुझे बताया कि उस पहली मुलाकात में ही उसने मुझे ‘गर्लफ्रेंड’ बनाने का मन बना लिया था.

पर मैं इससे अनजान थी. पहले सिर्फ दोस्ती हुई.

वो मेरा बहुत ख़याल रखता था.

कभी कॉफी, कभी किताबें ख़रीदने, कभी बस यूंही साथ चलने के बहाने वो मिलता रहता.

फिर हम बिना बहाने मिलने लगे. सिर्फ़ मिलने के लिए मिलने लगे.

मैं मेट्रो लेकर जाती और वो मुझे मेट्रो स्टेशन के बाहर मिल जाता.

फिर साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के ‘रिज’ वाले इलाके में जाते.

जंगल जैसा ये इलाका हमारे जैसे कई जोड़ों के तन्हा व़क्त बिताने की पसंदीदा जगहों में था.

दोस्ती से मोहब्बत तक का सफ़र

दोस्ती से इस मोहब्बत के रिश्ते तक पहुंचने में, उस पर विश्वास क़ायम करने में मुझे साल-भर लग गया.

इसके बावजूद हम जब बाहर मिलते तो कभी मन शांत नहीं होता था.

हर व़क्त लगता था कि हमें कोई देख रहा है. कोई जाननेवाला, मेरे परिवार का कोई शख़्स.

जो देख सकते हैं उनके लिए ये इतना आसान होता है. कनखियों से आसपास के लोगों पर नज़र रख लेते हैं

मेरा बॉयफ्रेंड ध्यान रखता था पर मैं खुद नहीं देख सकती थी इसलिए हमेशा ‘एक्सपोज़्ड’ लगता था.

डर बना रहता था कि कहीं पकड़े ना जाएं.

पर मिलना-जुलना फिर भी कम नहीं किया. चाहत ही ऐसी थी.

जब एक ब्लाइंड लड़की से लड़के को प्यार हुआ…

उन पलों का अहसास चाहे डर की वजह से अधूरा रहता पर ना होने से तो बेहतर था.

आखिर मेरे बॉयफ़्रेंड को हॉस्टल मिल गया. जब वहां मिलने लगे तब मुझे उसके साथ पूरी तरह महफ़ूज़ महसूस होने लगा.

पर ये ‘फेरीटेल’ नहीं है, ज़िंदगी की सच्चाई कहानियों से परे होती है.

कुछ समय बाद मेरे दोस्तों से मुझे पता चला कि वो किसी और लड़की के साथ उतना ही क़रीब है जैसा मेरे साथ.

‘डिसएबिलिटी’ का फ़ायदा उठाकर धोखा

मैंने उससे पूछा तो वो झूठ बोलता रहा. और मेरे लिए सच का पता लगाना मुश्किल था.

मैं किसी आम लड़की की तरह उसका फ़ोन नहीं चेक कर सकती थी ना अचानक उसके हॉस्टल जाकर उसका कमरा.

फिर एक दिन मुझे सोशल मीडिया की एक ‘चैट’ मिली जिसे वो ‘डिलीट’ करना भूल गया था.

मेरे कम्प्यूटर पर लगे ‘स्क्रीन रीडिंग सॉफ़्टवेयर’ से मैं उसे पढ़ पाई और साफ़ हो गया कि मेरे साथ धोखा हुआ है.

विश्वासघात किसी के लिए भी मुश्किल हो सकता है पर मेरे लिए वो मेरी ‘डिसएबिलिटी’ का फ़ायदा उठाकर किया गया धोखा था.

मेरे बॉयफ़्रेंड ने मुझे कमज़ोर साबित कर दिया था.

मेरा दिल तो टूटा ही था, आत्मविश्वास चकनाचूर हो गया.

मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट हूं, राष्ट्रीय स्तर की एथलीट हूं और अपने हॉस्टल की ‘प्रेज़िडेंट’ भी.

मेरे दोस्तों ने कहा कि ‘ब्लाइंड’ होते हुए इतना कुछ हासिल कर लिया है, सो अब बॉयफ़्रेंड नहीं भी रहा तो क्या फ़र्क पड़ता है?

दूसरा ब्वॉयफ्रेंड

पर फ़र्क पड़ता है. हर इंसान की ज़िंदगी में प्यार का अलग कोना होता है.

बाक़ि सब से परे, वो एक अलग चाहत है और उसके बिना मैं अधूरा और खोख़ला महसूस कर रही थी.

इसी अधूरेपन के बीच मुझे मेरा दूसरा बॉयफ्रेंड मिला.

वो ‘नॉर्मल’ है. आम लोगों की तरह मुझे देख सकता है. शायद ये भी आकर्षण की एक वजह बनी.

पर शायद इसी वजह से वो मुझे अच्छे से नहीं समझ पाता.

मेरा वैसे ख़याल नहीं रखता जैसा मैं चाहती हूं.

हाथ पकड़कर पार्टी में ले तो जाता है पर फिर दोस्तों के साथ बातचीत का हिस्सा नहीं बनाता.

रिश्ते में ‘डिसएबिलिटी’ का अहसास

मैं एक कोने में रहती हूं, जैसे कोई चीज़ पड़ी हो.

वो समझदार है, मुझसे उम्र में बड़ा है और पढ़ाई में तेज़.

पर समझ नहीं आता कि हमारे रिश्ते में ‘रोमांटिक’ प्यार ज़्यादा है या हमदर्दी.

किसी ‘ब्लाइंड’ के साथ देखी है कोई फ़िल्म?

एक बार फिर हमारे रिश्ते में मुझे मेरी ‘डिसएबिलिटी’ का अहसास हो रहा है.

ऐसा लगने लगा है कि मैं देख नहीं सकती इसलिए मेरी ज़िंदगी में मोहब्बत का सच्चा अहसास शायद नहीं होगा.

पर ये रिश्ता तोड़ भी नहीं पा रही, क्योंकि आंखों में रौशनी ना सही इश्क की चाहत में दिल आपकी ही तरह धड़क रहा है.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित एक ‘ब्लाइंड’ लड़की की कहानी)

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