मूवी रिव्यूः गड्ड-मड्ड रंगीलेपन की बानगी है गुड्डू रंगीला– Article

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कुल मिलाकर ‘गुड्डू रंगीला’ एक औसत मनोरंजक फिल्म तो है, पर ऐसी रचना नहीं है जो लंबे समय तक याद रहे या जिसका उदाहरण दिया जा सके।

अजय गर्ग

अजय गर्ग

| News18India.com

Updated: July 3, 2015, 5:23 PM IST

निर्देशकः सुभाष कपूर

सितारेः अरशद वारसी, रोनित रॉय, अमित साध, अदिति राव हैदरी, दिब्येंदु भट्टाचार्य, राजीव गुप्ता, ब्रजेंद्र काला

रेटिंगः 2.5 स्टार

एक समय था जब हिंदी सिनेमा में सिंधी भाषा का अच्छा-खासा तड़का लगता था। सिंधी भाषी चरित्र फिल्मों में होते थे और उनका बोलचाल का अंदाज खासा मनोरंजन करता था। फिर पंजाबी, बंगाली तथा बिहारी को जगह मिलने लगी। एक दौर में गोवानी अंदाज भी खूब चला। अभी गुजराती का दौर भी हिंदी सिनेमा में परवान चढ़कर बोल रहा है। इसी बीच, फिल्मकारों के हाथ हरियाणवी बोली के रूप में एक नया-नवेला तुरुप का पत्ता लगा है। हर भाषा या बोली के ठेठपन की अपनी खूबसूरती है, उसके अपने कुछ प्रचलित जुमले हैं और हिंदी सिनेमा की दुनिया में उस भाषा को तब तक निचोड़कर बेचा जाता है, जब तक बस भूसा बाकी न रह जाए। इसी लीक पर आज के ज्यादातर हिंदी फिल्मकार चल रहे हैं। आए दिन हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रची-बसी कहानियां परदे पर आ रही हैं। और अगर इसके साथ खाप के मुद्दे की चाशनी भी मिल जाए तो? फिर तो कहना ही क्या! हिंदी सिनेमा की ऐसी फिल्मों की कड़ी में हम सुभाष कपूर की नई फिल्म ‘गुड्डू रंगीला’ को भी रख सकते हैं।फिल्म एक अच्छा मनोरंजन देने के वायदे के साथ शुरू होती है और एक हद तक इसमें सफल भी रहती है, लेकिन यह सफलता कुछ नया परोसने में नहीं है। यह सफलता किरदारों को मजबूत रूप से बुनने और उनको अंत तक संभाले रखने में है। यकीनन इसके किरदारों में लंबे समय तक दर्शकों के दिलो-दिमाग में रहने का माद्दा है। दूसरी सफलता इसके हरियाणवी अंदाज में बोले गए जुमलों तथा संवादों में हैं, जो उस बड़े दर्शक वर्ग को जरूर पसंद आएंगे, जिसका ऐसे जुमलों से वास्ता नहीं है या ऐसे पंच जिसने नहीं सुने हैं। लेकिन संवादों के मामले में उलट बात यह है कि भेड़चाल के हिसाब से चलने वाले हिंदी सिनेमा में जब हरियाणवी का रस निचुड़ चुका होगा, तो यकीनन ‘गुड्डू रंगीला’ के पंच हमें गुदगुदा नहीं पाएंगे।

सुभाष कपूर चूंकि देश के उसी हरियाणवी-भाषी इलाके के हैं तो उन्होंने ये अंदाज अपनी फिल्म में बखूबी पिरोया है। इस लिहाज से फिल्म मनोरंजन जरूर करती है, लेकिन पूरी फिल्म में आप एक ऐसे तत्व की कमी लगातार महसूस करते हैं, जो फिल्म का यूएसपी हो और जिसमें फिल्म के प्राण बसते हों। वो तत्व जो सुभाष कपूर की ‘जॉली एलएलबी’ में था और जिस वजह से वह फिल्म आज भी हमारे जहन के किसी कोने में सुरक्षित है। उनकी इस नई फिल्म में घटनाएं जरूर घटती हैं लेकिन वो इस तरह से हैं जैसे एक छल्ले में दूसरा, फिर तीसरा, फिर चौथा…। एक धागे में मोती पिरोए गए हों, ऐसा नहीं है, कहीं भी।

हालांकि, हल्के-फुल्के मनोरंजन के बीच कथानक का बासीपन जरूर खलता है। खाप पंचायत तथा जात-पात से बाहर शादी करने पर उसके तुगलकी फरमानों को रीढ़ बनाकर जो कहानी पिरोई गई है वह कहीं नहीं बांध पाती है। आप केवल वाकयों का मजा लेते हैं तो ठीक, वरना उनके बीच तारतम्य बैठाने लगेंगे तो निराश ही होंगे। बहुत ध्यान से देखेंगे तो कई जगह निरंतरता की गड़बड़ और कई जगह अतार्किकता के दंश चिढ़ पैदा कर देंगे। उदाहरण के लिए – ठेले के साथ हथकड़ी से बंधे बंगाली का गोलियां चलने पर कूदकर ड्रम के पीछे जा छिपना, आखिरी दृश्यों में रंगीला के कहने पर गुड्डू का बेबी के साथ भागना और दूसरे ही पल बेबी का रंगीला के पीछे खड़े मिलना, रंगीला का इस पल शिमला होना और अगले पल रोहतक के गांव मीरपुर में दिखकर फिर शिमला पहुंच जाना! फिल्म का अंतिम दृश्य हमें सत्तर-अस्सी के दशक की फिल्मों का दोहराव लगता है, जब विलेन को मरा समझ छोड़ दिया जाता है, लेकिन वो उठ खड़ा होता है और गोली चलाने से पहले नायिका की गोली का शिकार हो जाता है।

दिमाग को परे रखकर यह फिल्म देखे जाने के अलावा इसके मजबूत किरदारों को दमदार अदाकारी से निभाए जाने की वजह से भी देखा जा सकता है। कलाकारों का चयन बेहतरीन है और अरशद वारसी (रंगीला), अमित साध (गुड्डू), रोनित रॉय (बिल्लू), राजीव गुप्ता (हवलदार गुलाब सिंह) तथा दिब्येंदु भट्टाचार्य (बंगाली) आपको परदे पर अभिनय किए जाने का अहसास ही नहीं होने देते हैं। अदिति राव हैदरी (बेबी) के किरदार में औसत हैं पर उन्हें ज्यादा कुछ करने को मिला भी नहीं है। कुल मिलाकर ‘गुड्डू रंगीला’ एक औसत मनोरंजक फिल्म तो है, पर ऐसी रचना नहीं है जो लंबे समय तक याद रहे या जिसका उदाहरण दिया जा सके।



First published: July 3, 2015

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