बेजान फिल्म है ‘लेकर हम दीवाना दिल’– Article

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दो बेस्ट फ्रेंड डीनो यानी अरमान और करिश्मा यानी दीक्षा सेठ 20 साल के टीपिकल अमीर बच्चे हैं, जो अपना वक्त कॉलेज कैंपस से दूर नाइट क्लब में बिताते हैं।

राजीव मसंद

राजीव मसंद

Updated: July 5, 2014, 6:25 AM IST

मुंबई। अरमान जैन की फिल्म ‘लेकर हम दीवाना दिल’ एक रुकी हुई और बेजान लव स्टोरी है। आपको विवेक ओबराय की फिल्म ‘साथिया’ याद है, अब बस उस फिल्म को लीजिए उसके बाद लीड पेयर की जबरजस्त केमेस्ट्री को निचोड़ लीजिए, मणिरत्नम द्वारा कुछ शानदार सींस को हटा दीजिए उसके बाद आपको जो मिलेगा वो है ये फिल्म। दो बेस्ट फ्रेंड डीनो यानी अरमान और करिश्मा यानी दीक्षा सेठ 20 साल के टीपिकल अमीर बच्चे हैं, जो अपना वक्त कॉलेज कैंपस से दूर नाइट क्लब में बिताते हैं।

जब करिश्मा का परिवार उसके शादी तय करता है एक ऐसे लड़के से जिसे वो नहीं जानती है। करिश्मा और डीनो एक दूसरे के साथ भाग जाते हैं। गोवा से नागपुर और वहां से छत्तीसगढ़ के जंगलों से होते हुए ये नया शादीशुदा जोड़ा हमेशा उन्हें ढूढ रहे अपने परिवारवालों से एक कदम आगे रहता है। बाद में दोनों में झगड़े शुरू हो जाते हैं और इनका प्यार नफरत में बदल जाता है। और वो अपनी शादी को खत्म कर देना चाहते हैं।

जब फिल्म काम नहीं करती इसकी कई वजहों में से एक अहम वजह है कि इसके राइटर-डायरेक्टर द्वारा की गई लेजी स्क्रिप्ट, जो फिल्म में कुछ भी ओरिजनल लेकर नहीं आती है। राजकपूर के नाती अरमान स्क्रीन पर काफी कंफर्टेबल हैं। वहीं दीक्षा भी बेहद कॉन्फिडेंट लगती हैं। लेकिन फिल्म में दोनों वो चार्म लेकर नहीं आ पाते जो होना चाहिए।



अली खासतौर पर अपनी फीमेल नायक के साथ नाइंसाफी करते हैं। जिसे इतना बिगड़ैल दिखाया है कि आप चाहेंगे की उसकी मुलाकात स्क्रूड्राइवर से मारने नाले उस सीरियर किलर रितेश देशमुख से हो जाए जिसे आपके ‘एक विलेन’ में देखा था। मैं इस फिल्म को 5 में से डेढ़ स्टार देता हूं हद से ज्यादा बोर होने को तैयार हो जाइए।

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