‘बच्चे ने मुझ पर थूका और उसके पापा हंसते रहे’

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राजधानी दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में 24 सितंबर को एक नाईजीरियाई मूल के छात्र अहमद को खंभे से बांधकर काफी देर बुरी तरह पीटा गया.

लोगों को उनपर चोरी करने की कोशिश करने का शक था. जब पुलिस आई तो वो गंभीर रूप से घायल थे. पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था.

अहमद को सज़ा ‘हाथों-हाथ’ देने की कोशिश की गई. लेकिन भीड़ ने जो जुर्म किया, उसके बारे में शायद ना पता चल पाता अगर इस घटना का वीडियो वायरल ना होता.

दो हफ्ते बाद वीडियो सामने आया तो पुलिस ने इस मामले में पांच लोगों को गिरफ़्तार कर लिया है.

क्या मालवीय नगर की घटना भी सिर्फ़ एक अपराधिक घटना है या लोगों में दूसरे मूल के लोगों को लेकर डर और भ्रम से जन्मी हिंसा?

डीसीपी ईश्वर सिंह ने मीडिया को बताया कि अगर लड़के ने चोरी की भी थी तब भी किसी को उसे पीटने का हक नहीं है. साथ ही उन्होंने साफ किया कि ये नस्लवाद की घटना नहीं है.

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‘क्रिकेट खिलाड़ियों को पहचानते हैं, हमें क्यों नहीं’

मालवीय नगर के खिड़की एक्सटेंशन में रह रहे तबीज़े आइवरी कोस्ट से आए हैं और पिछले 7 साल से भारत में रह रहे हैं.

तबीज़े ने बताया कि वो आए दिन महसूस करते हैं कि यहां के लोग उन्हें कितना अलग समझते हैं. वो बाहर खरीददारी करने जाते हैं तो उन्हें ‘नस्लवादी’ शब्द सुनने पड़ते हैं.

उनका कहना है कि ये उनके काले रंग की वजह से है जबकि भारत में भी इस रंग के लोग रहते हैं.

मैट्रो में लोग उन्हें घूरते हैं और फिर आपस में उन पर हंसते हैं. अफ्रीकी क्रिकेट खिलाड़ियों को पहचानते हैं, लेकिन जब उन्हें देखते हैं तो जैसे पहली बार किसी अफ्रीकी को देखा हो.

वो बताते हैं, “एक बार मैं एक बिल्डिंग के नीचे खड़ा था. बालकनी में खड़ा एक बच्चा अचानक मुझ पर थूकने लगा. हम तीन लोग खड़े थे, मैं और मेरे दोस्त. वो 3-4 साल का बच्चा था. मैं जानता हूं कि उसे नहीं पता, लेकिन उसके पिता वहीं ख़ड़े थे, लेकिन वो खड़े होकर हंस रहे थे. वो अपने बच्चे को कितनी ग़लत शिक्षा दे रहे थे. जब वो बड़ा होगा तो यही सोचेगा कि वो नॉर्मल है और काला नहीं. इस तरह की हर बात पर मैं पुलिस में तो नहीं जा सकता.”

थोड़ी उम्मीद के साथ तबी़ज़े कहते हैं, “इन सब घटनाओं से मैं दुखी हुआ, लेकिन मैं जानता हूं कि यहां बहुत अच्छे लोग भी हैं. कई भारतीय मेरे दोस्त हैं. मेरे देश में भी कई भारतीय हैं. कई पंजाबी लोग हैं. हम उन्हें देखकर, उनसे प्रभावित होकर यहां आते हैं लेकिन यहां अलग तरह के लोग मिलते हैं. काफी वक्त से ऐसी घटनाएं हो रही हैं. अगर कोई आपके घर में चोरी करता है तो आप पुलिस बुला सकते हैं ना कि खुद उसे जानवरों की तरह पीटना शुरू कर दें.”

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अनीश

उनका क्या कसूर?

अनीश अपनी पत्नी और दो साल की छोटी बच्ची के साथ तबीज़े के घर के ऊपर रहते हैं. इस इलाके में वो चार साल से रह रहे हैं.

उन्होंने बताया कि लोग ऐसा मानते हैं कि अफ्रीकी मूल के लोग गंदे होते हैं, बच्चा काट कर खा जाते हैं, रात को घर में घुस जाते हैं लेकिन उन्होंने ना तो ऐसा होते देखा और ना सुना. नीचे रहने वाले लोग भी बहुत अच्छे से रहते हैं.

वो बताते हैं, “ये बाहर के देश के हैं. यहां के सब एक हो जाते हैं. किसी को 2-4 मारते हैं तो हम जैसे पूछते हैं कि क्या हो गया तो वो कहते हैं कि ये बाहर के लोग हैं परेशान कर रहे हैं. सुनने वाले ने सुना पर समझा नहीं और वो भी पिल पड़ा मारने के लिए. समझदार बंदा होगा तो पहले पुलिस बुलाएगा, बीच-बचाव करेगा लेकिन हमारे यहां ऐसी सोच है नहीं.”

वो बताते हैं कि उन्होंने खुद एक-डेढ साल पहले एक महिला के साथ ऐसा होते देखा था, “वो महिला काली थी, अफ्रीकी मूल की थी. उसके बच्चों का रंग साफ था. लोगों को लगा कि ये इसके बच्चे नहीं हैं, ये कहीं से उठा कर ले आई है. भीड़ ने उसे बुरी तरह पीटा. जब पुलिस आई तो पता चला कि उसी के बच्चे थे.”

पुलिस ने बताया कि ये केस कई बार हो चुका है. अब उस महिला और उसके बच्चों के रंग में फर्क है तो इसमें उनका क्या दोष.

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‘अफ़्रीकी मूल के लोग ज़्यादा इज़्ज़त देते हैं’

खिड़की एक्सटेंशन में रहने वाले पीआर कौशिक लोगों को किराए पर मकान देते हैं. वो इस इलाके में पिछले 40 साल से रह रहे हैं.

वो कहते हैं कि लोगों को अपनी थाली में देखना चाहिए. कौन क्या खा रहा है इससे क्या मतलब. अगर बाहर से आने वाले लोग खराब हैं तो फिर सरकार इन्हें वीज़ा देना ही बंद कर दें. लेकिन ऐसा हुआ तो दूसरे देश में भी अपने लोगों को ना जाने दे.

वो कहते हैं कि इनके साथ मार-पीट भी बेवजह है, “एक दफ़ा इंसान को सोच लेना चाहिए कि ये बर्ताव कोई उनके साथ करे दूसरे देश में तो उन्हें कैसा लगेगा. ये जो रंग का मसला है वो तो हिंदुस्तान में होना नहीं चाहिए. क्योंकि यहां हर रंग का बंदा रहता है.”

वो कहते हैं, “जहां तक मकान की साफ-सफाई की बात है, बहुत अच्छा मेंटेन करते हैं. इज्ज़त देते हैं.”

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‘हम फेयर एंड लवली वाला देश हैं’

2004 से खिड़की इलाके में सामाजिक कार्य करने वाली आस्था चौहान कहती हैं कि हम रेसिस्ट शब्द का मतलब अमरीकी मीडिया में देख कर समझते हैं. दरअसल, भारत में हम काले रंग से नफ़रत करते हैं. हम फेयर एंड लवली वाला देश हैं.

अफ़्रीकी मूल के लोगों की रंगत और उनके लंबे-चौड़े डील-डौल से भारतीय पुरूष जो असुरक्षा महसूस करता है उसे वो उन पर हिंसा के ज़रिए निकालता है.

अपराधों को लेकर वो कहती हैं कि ज़रूर कई अफ़्रीकी मूल के लोग ड्रग जैसे अपराधों से जुड़े हैं और ये बात उनके ख़िलाफ़ भी जाती है लेकिन जब आप इसकी जड़ में जाएंगे तो पता चलेगा कि ड्रग डीलिंग में भारतीय भी जुड़़े हैं.

किसी भी समस्या का समाधान तभी शुरू किया जा सकता है जब हम मानने के लिए राज़ी हों कि समस्या है. किसी भी अपराध के पीछे एक मानसिकता छुपी होती है जिसे पहचानना ज़रूरी है और फिर सुधारना भी.

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