तलवार दंपति: फ़ैसला रिहाई का, सवाल इंसाफ़ पर

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PTI

दिल्ली के पास नोएडा में रहने वाले डेंटिस्ट राजेश तलवार की 14 साल की बेटी आरुषि तलवार की हत्या 15-16 मई 2008 की रात हुई थी.

एक दिन बाद नौकर हेमराज का शव भी राजेश तलवार के पड़ोसी की छत से बरामद हुआ.

इस केस में यूपी पुलिस और सीबीआई ने राजेश तलवार को मुख्य अभियुक्त बनाया.

2013 में सीबीआई कोर्ट ने तलवार दंपति को उम्रकैद की सज़ा सुनाई और तबसे दोनों ग़ाज़ियाबाद की डासना जेल में सज़ा काट रहे थे.

बुधवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सीबीआई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए तलवार दंपति को रिहा करने का फ़ैसला सुना दिया.

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हाई प्रोफाइल केस

किसी हाई प्रोफाइल केस में जब ऐसा मोड़ आता है तब कई स्वाभाविक सवाल भी उठते हैं कि आख़िर अपराध किया किसने?

क्या हमारी जांच संस्थाएं ठीक से काम नहीं कर पाती हैं?

अगर किसी को ग़लत आरोप में सज़ा हुई तो उनका खोया हुआ वक्त और सम्मान कैसे वापस हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में वकील कपिल संखला ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि न्याय में अक्सर देरी हो जाती है. पुरानी कहावत है कि देर से न्याय मिलना मतलब न्याय नहीं हुआ.

उन्होंने कहा, “इस मामले में कोर्ट उतना दोषी नहीं जितना कि हमारी जांच संस्थाएं दोषी हैं. सवाल तो ये भी होना चाहिए कि मृत आरुषि के चरित्र को दाग़दार क्यों किया गया. तरह-तरह की कहानियां कही गई.”

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सीबीआई के विकल्प

कपिल संखला ने कहा कि अभियोग पक्ष किसी तरह तथ्यों को तरोड़-मरोड़ कर केस जीतने की कोशिश करते हैं. उनका काम कोर्ट की मदद करना है, ना कि किसी भी तरीके से किसी के पक्ष में केस जीतना.

उन्होंने कहा, “अगर ये साबित होता है कि किसी को गलत सज़ा हुई तो प्रावधान है कि वो हर्जाने के लिए कोर्ट में जा सकता है. क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह के मामलों में ये मिल सकता है. लेकिन इसका इस्तेमाल आम नहीं है.”

आरुषि हत्याकांड मामले में नौ साल का वक्त लग गया. इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है. यानी हो सकता है कि इस मामले में आख़िरी फ़ैसला आने में और देर हो सकती है.

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तलवार दंपति पर क्या फ़ैसला?

मुक़दमों का बोझ

न्याय में देरी कोई नई बहस नहीं है. भारत में लगभग 3 करोड़ मुकदमें अलग-अलग अदालतों में चल रहे हैं. 60,000 के क़रीब मामले सुप्रीम कोर्ट के पास हैं.

पू्र्व मुख्य न्यायधीश टीएस ठाकुर ने भी केंद्र सरकार से अपील की थी कि जजों की संख्या बढाई जाए क्योंकि अदालतों पर मुकदमों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है.

2015 की नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि जेलों में पड़े कैदियों में 67.2 फ़ीसदी अंडरट्रायल हैं.

अंडरट्रायल यानी वो क़ैदी जिन पर मुक़दमा चल रहा है लेकिन कोई आरोप साबित नहीं हुआ है.

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